शक्तिपीठ ज्वाला देवी, जल रही भक्ति की अखंड ज्योति

shakti peeth jwala devi temple at kangda in himachal pradesh शक्तिपीठ

कांगड़ा। कई बार लोगों में इस बात की बहस चलने लगती है कि भगवान कहां हैं, आखिर भगवान हैं तो फिर उनकी शक्ति का अहसास कहाॅं है, लेकिन जो ईश्वर के भक्त होते हैं उन्हें समय – समय पर ईश्वर की भक्ति का अहसास होता है। कुछ ऐसे जागृत स्थल हैं जहां भगवान की मौजूदगी के प्रमाण भी मिलते हैं, हालांकि आध्यात्म को लेकर कहा गया है यह श्रद्धाभाव से मानने वाले को ही समझ में आता है। मगर इस भारत भूमि जिसे देवों की स्थली कहा जाता है वहां आज भी कई ऐसे जागृत क्षेत्र हैं जहां दर्शन कर आपको अद्भुत और अलौकिक चमत्कारों का अहसास होगा। ऐसे शक्तिपीठ में आकर लोगों को नई ऊर्जा मिलती है। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में कालीधार की पहाड़ी है। इसके बीच में ही आपको दीव्य शक्ति के दर्शन होते हैं।

 

यह क्षेत्र शक्तिस्थल है। इसे माता सती के शक्तिपीठों में से एक कहा गया है। यूॅं तो शक्तिपीठ 51 होते हैं लेकिन धार्मिक मान्यताओं में कहीं – कहीं इनकी संख्या 52 भी बताई गई है। यह देवी मंदिर उन्हीं शक्तिपीठों में से एक है। जो शक्तिपीठ यहां प्रतिष्ठापित है उसे ज्वाला देवी के नाम से जाना जाता है। इसे ज्वालामुखी देवी का मंदिर या ज्योतावाली माता का मंदिर और नगरकोट के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के शीर्ष भाग पर सोना लगाया गया है। जो कि माता के श्रद्धालुओं का शक्ति को समर्पण दर्शाता है। साथ ही मंदिर की भव्यता को बढ़ाता है।

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सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इस क्षेत्र में एक ज्योत जिसे ज्वाला भी कहा जाता है अनादिकाल से जल रही है। यह ज्योत आज तक अखंडरूप से जल रही है। इसे लेकर कई लोग आश्चर्य जताते हैं। मंदिर में आश्चर्यजनक कई और ऐसी बातें हैं जो श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींचती है। पौराणिक मान्यता है कि, माता सती के वियोग में जब भगवान शिव उनकी देह उठाकर गमन कर रहे थे।

 

उसी समय सृष्टि संचालन के लिए और विधान हेतु भगवान श्री विष्णु ने अपने सुदर्शनचक्र से माता सती की पार्थिव देह पर वार किया। इस वार से माता सती की पार्थिव देह 51 विभिन्न भागों में बंट गई। माता की पार्थिव देह का अंग जिन क्षेत्रों में गिरा वहां एक – एक शक्तिपीठ प्रतिष्ठापित हुए। इन शक्तिपीठों में माता पार्वती साक्षात् शिव के साथ निवास करती हैं।

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शक्तिपीठ ज्वाला देवी क्या है कथा

 

ज्वाला देवी में ज्वाला अनवरत जलते रहने की मान्यता है कि अतिप्राचीनकाल में साधक और नाथ संप्रदाय के गोरखनाथ माता की आराधना करते थे। माता उन्हें प्रसन्न होकर उनके लिए प्रकट होती थीं। एक बार गोरखनाथ को भूख लगी थी ऐसे में माता को आग जलाकर गोरखनाथ ने पानी गर्म करने के लिए कहा और स्वयं शिक्षा मांगने निकल गए। माता गोरखनाथ का इंतज़ार करती रहीं, गोरखनाथ लौटकर नहीं आ पाए। माना जाता है कि तभी से माता यहां आग जलाकर अपने भक्त गोरखनाथ का शक्तिपीठ   में इंतज़ार  कर रही हैं।

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मान्यता यह भी है कि जब कलियुग समाप्त होगा और सतयुग प्रारंभ होगा तब गोरखनाथ लौटकर माता के पास आऐंगे। तब  तक शक्तिपीठ की यह अग्नि जागृत स्वरूप में जलती रहेगी। मंदिर क्षेत्र में अन्य आठ ज्वालाऐं मां अन्नपूर्णा, चण्डी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती,अम्बिका और अंजी देवी का प्रतीक हैं। यहां चांदी के दीप प्रतिष्ठापित हैं जिनमें जल रही ज्योत को हालक्ष्मी कहा जाता है। मंदिर परिसर में एक पानी का कुंड भी है। कुंड को देखने पर लगता है कि इसमें खौलता हुआ गर्म जल है लेकिन जब जल को छूकर देखते हैं तो जल अति ठंडा होता है।

 

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