महात्मा गाँधी : शांतिदेवी का 1926 में हुआ था पुनर्जन्म

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पुनर्जन्म कई धर्म इसे मानते है तो कुछ इस बात को नकारते है. मुस्लिम धर्म में इस बात को मिथ्या माना गया है,जबकि हिन्दू धर्म विशेषत: बोद्ध जैन आदि धर्म में पुनर्जन्म की व्याख्या में विश्वास किया जाता है|

आज हम आपको विश्व की सबसे मान्य पुनर्जन्म की कथा से रूबरू करवाएगे जिसे स्वयं महात्मा गांधी जैसी शक्सियत ने भी स्वीकार किया है.

यह घटना 19 वी सदी के प्रारम्भ में घटित हुई थी,18 जनवरी सन 1902 मथुरा के चत्रभुज में एक बालिका का जन्म हुआ था, जिसका नाम लुग्दी देवी रखा गया था. जब वह 10 वर्ष की थी तो उनका विवाह मथुरा के ही निवासी पं. केदारनाथ चौबे जो कपड़ा व्यवसायी थे,उनसे कर दिया गया था. लुग्दी देवी बहुत ही धार्मिक व कर्तव्य परायण स्त्री थी. उनका पहला पुत्र मृत पैदा हुआ था.

25 सितम्बर 1925 को लुगदी देवी पुन: माँ बनी उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, परन्तु 9 दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई, 11 सित.1926 को दिल्ली के एक छोटे मोहल्ले में बाबुरंग बहादुर माथुर के यहाँ एक पुत्री का जन्म हुआ, जिसका नाम शांतिदेवी रखा गया| वह बच्ची बड़े ही विचित्र स्वभाव की थी, प्राय: अन्य बच्चो से अलग ही रहती थी. जब वह 4 वर्ष की हुई तो वह अपने पिछले जन्म की बाते अपने माता-पिता से करने लगी| वह यह भी कहती थी की उसके पति गौरे है व चश्मा लगाते है| उनके गाल पर मस्सा है. वह पूर्व जन्म में मथुरा रहती थी. उसका एक पुत्र भी है.

उसने एक बार अपनी माँ को यह भी बताया की डिलेवरी के समय उसका एक बच्चा मृत हुआ था| उसे डाँक्टर को बताया गया,उसने विस्तारपूर्वक डॉ. को चिकित्सा प्रकिया बताई, जिसे सुन डॉ. भी आश्चर्य में पड़ गए | वह बार-बार मथुरा जाने की जिद् करती थी. वह कभी भी अपने पति का नाम नहीं लेती थी. एक बार उनके दूर के रिश्तेदार बाबू बीचन चंद्र जो दिल्ली के दरियागंज के रामजस उच्च विद्यालय के प्राध्यापक थे. उन्होंने शांति देवी को प्रलोभन दिया की वे यदि उनके पूर्वजन्म के पति का नाम बता दे तो वे उन्हें मथुरा ले जाएगे|

इस प्रलोभन में आकर उन्होंने अपने पति का नाम बताया| बीचन चंद्रजी ने केदारनाथ जी को पत्र लिखा और सारी बाते विस्तारपूर्वक लिखी.केदारनाथ जी ने पत्र का उत्तर देकर बताया की शांतिदेवी जो भी कह रही है, वह सत्य है और वह उनके दिल्ली निवासी भाई पं. कांजिवन से मिले| पं. कांजिवन शांतिदेवी से मिलने जब उनके घर आये तो शांतिदेवी ने उन्हें शीघ्र ही पहचान लिया की वे केदारनाथ जी के चचेरे भाई है. और यह भी बताया की उन्होंने मटके में छुपाकर एक जगह पैसा रखा है. शांतिदेवी से मिलने केदारनाथ जी अपने पुत्र व तीसरी पत्नी के साथ आए| उन्हें शांति देवी ने पहचान लिया और यह भी कहा की उन्होंने लुग्दी देवी से वादा किया था कि वे दुबारा शादी नहीं करेंगे|

शांतिदेवी ने यह भी बताया की मथुरा में उनके घर के आँगन में कुआ था, जिसमे वह स्नान किया करती थी. महात्मा गाँधी जी ने इस केस की सत्यता की जांच के लिये 15 सदस्यों की एक कमेटी गठित की, यह कमेटी शांतिदेवी को लेकर मथुरा गई वहां पर तांगे में उन्हें बैठाकर वे केदारनाथ जी के घर की तरफ निकले, शांतिदेवी तांगे वाले को रास्ता बता रही थी.

शांतिदेवी ने यह भी बताया की केदारनाथजी की दुकान द्वारकाधीश मंदिर के सामने है. अंत में वह अपने कमरे में गई, और पैसे से भरा मटका निकालकर बताया| कमेटी ने यह निर्णय दिया की शांतिदेवी ही लुग्दी देवी है. शांतिदेवी आजीवन कुवारी ही रही| दोस्तों इस घटना के बारे में आप सोच रहे होंगे की यह कपोलकल्पना है पर यह अक्षरश:सत्य है. मानो या ना मानो.

 

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